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'The Cockroach Janata Party was born out of a meme, but it could be the beginning of serious change': Yogendra Yadav

भारतीय राजनीति को एक असामान्य प्रतीक मिल गया है: तिलचट्टा या कॉकरोच. पिछले हफ्ते, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त की टिप्पणियों के बाद कॉकरोच अचानक सुर्खियों में आ गया

'The Cockroach Janata Party was born out of a meme, but it could be the beginning of serious change': Yogendra Yadav
📌 मुख्य बातें

भारतीय राजनीति को एक असामान्य प्रतीक मिल गया है: तिलचट्टा या कॉकरोच. पिछले हफ्ते, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त की टिप्पणियों के बाद कॉकरोच अचानक सुर्खियों में आ गया

एक सुनवाई के दौरान, उन्होंने कथित तौर पर बेरोज़गार युवाओं, जो पत्रकारिता और एक्टिविज़्म की ओर बढ़ रहे हैं, की तुलना तिलचट्टों और परजीवियों से की.

बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका इशारा विशेष रूप से 'फर्जी और बेहूदा डिग्री' वाले लोगों की ओर था, न कि व्यापक रूप से भारत के युवाओं की तरफ.

लेकिन तब तक यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से फैल चुकी थी, जिससे गुस्सा, चुटकुले और एक 'मज़ेदार राजनीतिक विचार' के तौर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी )जन्म ले चुकी थी. सीजेपी कोई औपचारिक राजनीतिक पार्टी नहीं है, बल्कि राजनीतिक व्यंग्य पर आधारित एक ऑनलाइन आंदोलन है.

इसकी सदस्यता शर्तों में बेरोज़गार होना, आलसी होना, हमेशा ऑनलाइन रहना और 'पेशेवर तरीके से भड़ास निकालने की क्षमता' होना शामिल है.

पांच दिन में इंस्टाग्राम पर इसके 1.7 करोड़ से ज़्यादा फ़ॉलोअर हो चुके हैं. इसे अभिजीत दीपके ने बनाया, जो एक राजनीतिक संचार रणनीतिकार और बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र हैं.

अभिजीत का कहना है कि यह विचार एक मज़ाक के तौर पर आया था. लेकिन राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव को नहीं लगता कि यह महज़ एक मज़ाक है.

योगेंद्र यादव कहते हैं, "यह जो 'कॉकरोच जनता पार्टी' सोशल मीडिया पर एक मीम की तरह शुरू हुई, यह केवल हँसी-मजाक या गुस्सा नहीं है. देश के भीतर नीचे से एक सुगबुगाहट और छटपटाहट है क्योंकि व्यवस्था के बने-बनाए रास्ते और दरवाज़े बंद हो गए हैं. मजाक या चुटकुला हमेशा किसी न किसी गहरे दर्द से जुड़ा होता है, इसलिए हम इसका विश्लेषण मज़ाक में नहीं कर सकते. सरकार द्वारा इसे बैन करना एक गंभीर बदलाव की शुरुआत हो सकती है."

 कहते हैं कि जब भी कोई सरकार संस्थाओं पर कब्ज़ा कर लेती है और अपनी पूर्ण सत्ता स्थापित करती है, तब विद्रोह अनपेक्षित जगहों से पैदा होता है.

"1971 में इंदिरा गांधी की भारी जीत के बाद 1974 में जयप्रकाश आंदोलन शुरू हुआ, 1980 में राजीव गांधी की भारी मेजॉरिटी के बाद 1983 में असम आंदोलन उठा, 2009 की जीत के बाद 2011 में अन्ना आंदोलन और 2019 के दो साल बाद किसान आंदोलन शुरू हुआ. जब व्यवस्था के रास्ते बंद होते हैं, तो जनता कोई न कोई नया रास्ता ढूंढ ही लेती है."

सीजेपी के एक्स (पहले ट्विटर) हैंडल को बैन किए जाने को लेकर योगेंद्र यादव कहते हैं, "तानाशाह हुकूमतों को सबसे ज्यादा डर चुटकुलों से लगता है. जो सरकार चुटकुला सुन नहीं सकती, वह खुद एक चुटकुला बन जाती है. अगर बैन न लगाया जाता, तो शायद यह गुस्सा निकलकर शांत हो जाता, लेकिन अब यह बात दूर तक जाएगी."

इसके साथ ही उन्हें लगता है कि यह विपक्ष के लिए एक खतरे की घंटी है. युवाओं का इतनी बड़ी तादाद में एक मीम अकाउंट से जुड़ना यह दिखाता है कि विपक्ष उन्हें कोई आकर्षक विकल्प देने में नाकाम रहा है. वह यह भी कहते हैं कि विपक्षी नेताओं को यह समझना होगा कि युवा खुद उनके पास नहीं आएंगे, बल्कि नेताओं को युवाओं के पास जाना होगा.

लेकिन कई बार होता है कि लोगों का गुस्सा सोशल मीडिया पर लिखकर निकल जाता है, ज़मीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं होता. क्या यह भी ऐसा ही गुस्सा है और एक बार यह गुबार निकल गया तो फिर सब सामान्य हो जाएगा?

इस सवाल के जवाब में योगेंद्र यादव कहते हैं, "अगर इस पर बैन न लगाया गया होता तो यह सारी बात सच हो सकती थी कि गुस्सा था, गुबार था, निकाल लिया, निकल गया. लेकिन जब आपको गुबार निकालने से रोका जाता है, जब कहा जाता है कि आप ट्विटर पर एक चुटकुले का हिस्सा नहीं बन सकते... इसका मतलब है मामला गंभीर है. अब तक चुटकुला हमारे बीच में था. अब चुटकुले में सरकार शामिल हो गई है. अब चुटकुले की उंगली सरकार के ऊपर आ गई है. और अब यह बात दूर तलक जाएगी."

यह बदले ज़माने की भाषा है

लोग बहुत तेज़ी से इस अकाउंटस से जुड़ रहे हैं और अब यहां गंभीर राजनीतिक बातें भी हो रही हैं. आगे यह कहां जाता दिखता है, जैसे कि अगले हफ़्ते क्या होता दिखता है?

योगेंद्र यादव कहते हैं, "पहली बात तो यह उठेगी कि इस बैन को हटाया जाए. और मैं समझता हूं कि यह सिर्फ फॉलो करने वाले एक-सवा करोड़ नहीं बल्कि करोड़ों कंठ से आवाज़ आएगी कि बंद क्यों कर रहे हो? अरे चुटकुला है, मज़ाक है. मैं तो अगले कुछ घंटों की भी सोचता हूं कि यह बैन लगा के सरकार इसको कैसे जस्टिफाई करेगी? कुछ है जो होने के लिए तरस रहा है. कुछ है ज़मीन के नीचे जो हिल रहा है. वह क्या अभिव्यक्ति लेगा अभी भी हम नहीं जानते. लेकिन मुझे ज़रूर महसूस होता है कि इसे बंद करके सरकार ने बड़ा पंगा लिया है और हो सकता है जो मामला सिर्फ गुबार और चुटकुले में ख़त्म हो जाता वो किसी बड़ी दिशा में अब जा सकता है."

इसे लेकर बहुत सारी मीम्स बन रही हैं. क्या मीम्स मैनिफेस्टो की जगह ले रही हैं या फिर यह मीम ही मैनिफेस्टो बन सकती है आज के यूथ का?

योगेंद्र यादव को लगता है कि यह बदले ज़माने की नई भाषा है. वह कहते हैं, "मेरे ज़माने में लोग मैनिफेस्टो पढ़ा करते थे. आजकल लोग यूट्यूब देखते हैं. पहले लोग पोस्टर बनाते थे, अब मीम बनाते हैं. तो हर जनरेशन का नया ग्रामर हमें सीखना होगा. इस व्यंग्य के पीछे एक बहुत गहरा पॉलिटिकल मैसेज है और वह अगर सत्ताधारी दल और विपक्ष दोनों इससे नहीं सीखेंगे तो मैं समझता हूं वो अपनी ज़मीन खो जाएंगे."

"इतनी बड़ी तादाद में अगर भारत के युवा खुद को कॉकरोच से आइडेंटिफाई कर रहे हैं. क्या ये सिर्फ आक्रोश का प्रकटन है या जो भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था है उसमें बहुत गहरी निराशा को दिखा रहा है? हां इसमें निराशा है, फ्रस्ट्रेशन है लेकिन इस गुस्से के साथ जुड़ी हुई एक आशा है, एक आकांक्षा है. कहीं यह है कि अच्छा कोई तो कुछ करो इनके बस का नहीं. इनके बस का नहीं. इसे केवल इसके नेगेटिव एक्सप्रेशन में न देखिए. उस कॉकरोच के पीछे छुपी हुई आकांक्षा को, उम्मीद को कि कोई तो आके हाथ पकड़े. उस उम्मीद को देखिए."

Source: BBC
राष्ट्रीय BBC

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